PACH 23 : यह मेरे जज़्बात हैं



थड़ी - मुझे यादों में वापस ले गयी है

वो यादें जो दोस्तों के साथ थड़ी पर बैठे चाय की चुस्कियाँ लेते हुए आती थीं तब

पता नहीं क्यों आज एकदम से वापस आ गयी मेरे सामने मेरे अतीत की तरह

कविता तो बस एक बहाना है, मैंने आज दिल के दर्द को बस दबाया है

थड़ी बस एक ठिकाना ही है , मैं तो जाने अनजाने एक पनाह माँगने आया हूँ

इस भरी दोपहर में मैं कुछ बीती ज़िन्दगी ढूँढने आया हूँ , इसीलिए मैं PACH आया हूँ 

सुनता हूँ मैं कुछ शेर प्यार पे और सोचता हूँ की इनका होना किसी की ज़िन्दगी में कितना प्यार देता है

खुशकिस्मत हैं वो जिनको यह नसीब होता है 

लड़के और लड़की के बीच में एक अलग कश-म-कश देखी है

एक ही मनोकामना और दूसरे की मनोदशा में एक अलग ही युद्ध देखा है 

एक को है दूसरे से वासना की तलाश और दूसरे को प्यार की चाहत है


जिस्म जीतता है और रूह अपनी मंज़िल पाती है यह मालूम नहीं है

इस युद्ध का कोई अंत ही नहीं है

दरवाज़े खुलते हैं और वो भी आते हैं

चक्रधर जी हमारे बीच दोबारा आते हैं , वो कृष्ण और हम गोपियाँ बन जाते हैं

मंत्र मुग्ध हम उनको बस देखते जाते हैं, PACH एक मेले में बदल सा जाता है

जाने कहाँ कहाँ से दुनिया आ रही है यहाँ ??

क्या इसे ही कविता का जादू कहते हैं ? 

मैं एक जन्मदिन की खुशियों में शरीक हो गया हूँ

रंग बिरंगे गुब्बारे देख कर फिर से बच्चा बन गया हूँ

उस जन्मदिन वाली लड़की को देख कर फिर से ठिठक गया हूँ


वही चुलबुलाहट , मासूमियत अभी भी बरकरार है और अशोक जी का भी साथ है

फूटते गुब्बारे , बजती सीटियाँ , हुल्लड़ में समां बदल सा गया है 

रोहित की नहीं चाहिए में मैं फिर से खो गया हूँ

टिक टिक चलती घड़ी में मैं अपने मशीन बनने और इंसान होने का फर्क ढूँढ़ रहा हूँ

मैं अपने सपनों और हकीकत के बीच का फासला अभी तय कर रहा हूँ

मैं चक्रधर जी के साथ वसीम बरेलवी को सुन रहा हूँ हक्का बक्का सा

ज़िन्दगी को चंद पंक्तियों में सिमट आते देख रहा हूँ

खामोश दिल वाह वाह के इलावा और कुछ कह नहीं सकता है

मैं साहिल और कश्ती के बीच का रिश्ता देख रहा हूँ

दोनों को एक दूसरे पर निहाल होते महसूस कर रहा हूँ

करीब था की दूर का सवाल मैं उस ऊपर वाले से कर रहा हूँ

रास्ते में दुनिया से इश्क़, मोहब्बत , दोस्ती करता जा रहा हूँ


सफर तय करते करते थक सा गया हूँ मगर थकान होती नहीं महसूस मुझे 

आज की मॉडर्न लाइफ और पुरानी ज़िन्दगी का फर्क खुली आँखों से देखा है

माँ के हाथ की बनी रोटियाँ कहाँ अब इटालियन पिज़्ज़ा का मुक़ाबला कर पाती हैं?

लाइफ आगे निकलने की होड़ में ज़िन्दगी से काफी आगे निकल गयी है

और हम फिर कहते हैं की पुराना वक़्त लौट के नहीं आता

एक कवि होने की कहानी भी सुनता हूँ 

वो लिखता अपने दिल की है मगर दुनिया को तो पैसा दिलाने वाला काम पसंद है

दिल और पेट की लड़ाई में आत्मा मर जाती है, यह कोई क्यों नहीं सोचता है ?

मैं कठपुतलियों को भी देख रहा हूँ और देख रहा हूँ उन मनोरंजन करते हाथों के पीछे छुपे आँखों के दर्द को भी

हमें हँसाते हैं, गाने गाते हैं, कुछ पल के लिए अपने घर की चिंता को पीछे छोड़ कर


ऐसा अपनापन शायद ही हमको मिले कहीं

मैं नयी भाषाएँ सीखता हूँ, पगड़ी बाँधता हूँ 

मैं सौम्या की जन्मदिन की बधाई सुनता हूँ

किसी को तोहफे में दुआ लाते देखता हूँ

एक बेटी को अपनी माँ से सवाल करते देखता हूँ

एक ग़ज़ल भी सुनता हूँ मैं , और सुनता हूँ किसी की पसंद की पसंद वाहियात क्यूँ ?

क्यूँ जो मुझे पसंद है वो किसी और को पसंद है जो की मुझे नापसंद है

क्यूँ किसी की याद भूलती नहीं , क्यूँ जितनी बारिश हो वो भी कम है ?

क्यूँ किसी का अलविदा कहना ज़रूरी हैं ? 

क्यूँ उस लड़की का PACH को छोड़ कर जाना ज़रूरी हैं ?

क्यूँ डबडबाती आँखों को थाम कर बैठी है वो ?


यह सवाल मेरे हैं मगर इनका जवाब तो उसके पास भी नहीं 

वो कहते हैं न की किसी को भीगी आँखों से विदा नहीं करते तो चलो 

तुम्हारे लिए मुस्कुराने की कोशिश करते हैं 

और जो भी काम करो उसमें खुशियाँ मिलें तुमको 

और PACH ?? आती रहना उसमें.. दरवाज़े तो हैं ही नहीं जो कभी बंद हो 

PACH को देख कर हर जगह बोल उठती हैं

पर पता नहीं आज मेरा दिल यह सब कैसे कह गया ?

दबे अल्फ़ाज़ों को बाहर निकाल चुका हूँ मैं

एक परिवार से रिश्ता कब का जोड़ चुका हूँ

आज थड़ी पे यादों में कुछ साल पीछे लौट गया हूँ मैं

अपने ज़िन्दगी के कुछ पल खो कर फिर से थोड़ा जी लिया हूँ मैं

PACH 23 : यह मेरे जज़्बात हैं PACH 23 : यह मेरे जज़्बात हैं Reviewed by Shwetabh Mathur on 5:14:00 PM Rating: 5

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