PACH 50: कुछ चंद अल्फाज़




अरे ओ PACH मुबारक हो यार तुम्हें अपना हैप्पी बर्थडे. 50 के हो गए तुम सिर्फ 23 महीनो में ही. सही है. मैं खुद भी पलट कर देखता हूँ तो मुझे भी विश्वास नहीं होता की मुझे भी तुमसे चिपके हुए 44 pach हो गए हैं. अनूप , आविका, मागो, विवेक और बाकीयो के साथ कितना लम्बा सफ़र तय कर आया पता ही नहीं चला. पता चलता है न... जब पुरानी फोटो देखता हूँ. तुम भी सोच रहे होगे की आज अचानक यह चिट्ठी कैसे ? अरसा हो गया है न मेरी तरफ से कुछ आये हुए तुम्हारे लिए ? पहले शुरू में pach खत्म होने से 2 दिन के अन्दर वो मेरा “ pach पुराण" आना... सिलसिला यूँ ही चलता रहा कि बस फिर एक दिन दिल ने साथ नहीं दिया तो फिर लिखना ही बंद हो गया वो. बस यार ऐसे ही लिखने का कुछ मन किया है आज .


इस बार भी आने का कुछ पक्का नहीं था. अब तो तुम खुद भी देखते हो की मैं आ नहीं पाता. 2-3 महीने तो ऐसे ही निकल जाते हैं पलक झपकते. इस बार नरेन्द्र तो आने के लिए इतना जोर दे गया जैसे मैं नहीं आऊंगा तो मेरी गर्लफ्रेंड किसी और से शादी कर लेगी. गर्लफ्रेंड तो नहीं हाँ बस एक लालच में ज़रूर गया था. सबसे मिलने का मन था ज़रा... नहीं बहुत ज्यादा. इतने वक़्त से जो जुड़ा हूँ तो काफी नाम ऐसे हैं जिनसे मिलने की बहुत हसरत
होती है. काफी नए लोग दिखे थे तो यह अंदाजा हो गया था की मेरी गैर हाजिरी में काफी नए लोग जुड़ चुके हैं. नरेन्द्र , विवेक से मिल कर बहुत अच्छा लगा. हैरी की ख़ुशी देखते ही बनती थी. और वो अश्लील लौंडा आशीष, कहता था की बहुत मिस किया मुझे. मैंने भी किया इन दोस्तों को. बाकी जो नहीं आये इस बार उनको तो आँखें बस ढूंढती ही रही .



नए, पुराने लोगों के जब जज़्बात सुने तो सच में बोलती बंद हो गयी यार. हँसाने , रुलाने और सोच में डालने वाली बहुत सी रचनाएँ थी. मैं तो बस सुनता जा रहा था. अब मैं इन लोगों की तरह इतना बेहतरीन नहीं लिख सकता न. यह लोग एकदम बढ़िया लिखते हैं की क्या कहूँ ? कहाँ कहाँ तक सोच लेते हैं. वाह. मैं तो एक कोने में बैठ कर बस सुन सकता हूँ. चीज़ें लिखना अब मेरे बस में नहीं यार. अब शब्द नहीं मिलते , जज़्बात तो किसी के साथ अब खत्म ही हो गए. तुम्हारे वजूद को छुपा कर रखना भी एक कला है pach . घर पे कोई नहीं जानता की तुम हो. यह कुछ चंद मेरी आखिरी चिठ्ठियों में से हैं तुम्हारे लिए, क्यूंकि पता नहीं की आगे कभी कुछ लिख भी पाऊंगा की नहीं ? जिन 70 लोगों से आज तक तुम्हारे ज़रिये जुड़ा हूँ वो बेहतरीन लोग हैं. बस कुछ बातें बताना चाहता हूँ. वो पुराण अब शायद ही कभी लिख पाऊं तुम्हारे लिए, खुद के लिए कवितायेँ और शब्द लिखता नहीं, दूसरों की याद में लिखना छोड़ सा दिया है. मेरे आने का इंतज़ार मत किया करना दोस्त, हम कभी किसी महफ़िल में ऐसे ही किसी कोने में चुपचाप बैठे किसी के अल्फाज़ सुनते मिल जायेंगे. जब कभी दोस्तों की याद आएगी तो चले आयेंगे.. ज़िन्दगी कब कहाँ ले जायेगी पता नहीं.. कलम अब धीरे धीरे रुकने लगी है, पता नहीं कब हमेशा के लिए थम जाए.. तुम अपना ख्याल रखना. तुमसे अब कब मुलकात होगी पता नहीं, कुछ कह नहीं सकते.. हम बस दोस्तों से मिलने आ जाया करेंगे कभी कभी.. 


PACH 50: कुछ चंद अल्फाज़ PACH 50: कुछ चंद अल्फाज़ Reviewed by Shwetabh Mathur on 4:05:00 PM Rating: 5

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