पूछो.... कभी सोचा है तुमने ?





पूछो उससे रौशनी का मतलब जो देख न सकता हो

पूछो उस बच्ची से घर वालों का मतलब जो मेले में खो गयी है

पूछो उस किसान से मेहनत का मतलब जिसकी फसल बर्बाद हो 
गयी 

पूछो किसी से इश्क का मतलब जिसने खो दिया किसी को हमेशा 
के लिए 

पूछो किसी से दर्द का मतलब जो तन्हाइयों में रातें काटता है 

पूछो किसी से वक़्त के मतलब जिसने किसी अपने को हादसे में 
खोया है 

पूछो उससे एक पल का मतलब जो रेस में दूसरे नम्बर पर आया 
है

पूछो उससे अपनों का मतलब जिसका इस दुनिया में कोई न हो 

पूछ सकते हो किसी से ?

पूछो उस चिड़िया से आजादी का मतलब जो तुम्हारे घर के कोने में 
एक पिंजरे में क़ैद रोज़ पंख फड़फाड़ती अपने रिहा होने की राह 
देखती है

पूछो पत्नी की उन तरसती आँखों से बेचैनी का मतलब जो देर रात 
घर न आये पति की राह में दरवाज़े की ओर टकटकी लगाये रहती 
हैं

पूछो एक औरत से माँ न बन पाने का दुःख 

कभी तुमने पूछा है किसी बच्चे से उसका दुःख की जब वो औरों 
की तरह चल फिर नहीं सकता , उन माँ बाप के दिल पे रोज़ 
कितने तीर चलते होंगे यह सोचा है कभी ?

कभी पूछो उस बच्चे से बोल न पाने का दर्द या कभी आवाज़ न 
सुन पाने की एक अधूरी सी ख्वाहिश

                             

पूछो उन माँ बाप की जद्दोजहद दुनिया से जो रोज़ लड़ते हैं अपने बच्चे को दुनिया में बराबरी का दर्जा दिलवाने को क्यूंकि दुनिया कहती है वो अलग है

पूछो हाथ में चाय की ट्रे पकड़े उस लड़की के दिल का हाल जिसे देखने आने वालों का फिर कोई जवाब नहीं आया

पूछो उस पल पल इंतज़ार का मतलब जो तुम्हारा पालतू कुत्ता तुम्हारे आने के वक़्त तक करता है, दरवाज़े की चौखट पे बैठे कदमो की आहट सुनने को बेताब

पूछो उस पिता के दिल का हाल जब तक बेटी घर न आ जाए सही सलामत

पूछो भूख का मतलब उस लड़के से जो भरी दोपहरी में रोटी के लिए अपने कंधे पर झोला लटकाए कूड़ा बटोर रहा है

पूछो सामाजिक तिरस्कार का मतलब वृन्दावन की उन विधवाओं से जो अपनी ज़िन्दगी इन्ही गलियों में काटती हैं, आने जाने वालों के सामने हाथ फैलाए

पूछो बोझ होने का मतलब उन बूढे माँ बाप से जिनकी औलाद उन्हें वृधाश्रम में छोड़ गयी हैं

कभी सोचा है तुमने यह सब ?

पूछो घर की छत का सुकून उन फुटपाथ पे सोने वालों से

पूछो मजबूरी का मतलब उस वैश्या से जो रोज़ अपना बदन बेचती है चंद नोटों के लिए

पूछो ज़माने की उम्मीदें उन भारी बस्तों के बोझ तले दबे उन छोटे बच्चों से जो रोज़ एक मशीनी दौड़ दौड़ते हैं

पूछो फ़र्ज़ का मतलब उस फौजी से जो देश की खातिर गोलियां खा रहा है हर मौसम और लोग तब भी उसके बारे में नहीं सोचते

पूछो ......

The story behind this- All of us are experts in giving a general advice and console others by saying that atleast your situation is better than him/her without realizing that everyone`s fight is different and what might seem to be a trivial matter to you might be very big for the other person. This poem attempts to ask the person to step into the shoes of the other person and then think of the situation and how bad it is. If we can feel that thing, than maybe we wont give the advice that we give.

Secondly , we generalize things just by looking at them without knowing the back story. These lines put you into the real stories and what they are made of. What might just be bad luck for you, might be a lot of his effort that anyone had put in.

Its time to be humane once again. 

पूछो.... कभी सोचा है तुमने ? पूछो.... कभी सोचा है  तुमने ? Reviewed by Shwetabh Mathur on 7:43:00 PM Rating: 5

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