Memories

The places where moments reside

दिल की कलम से : किताबें, दोस्त और कनॉट प्लेस वाले मिस्टर सहाय...




लो भई 2014 का भी book fair आ गया और हमको फिर मौका मिल 
गया किताबों के बीच दिन काटने का... अब जो मज़ा stalls घूमने , 
किताबें देखने में है वो और कहाँ? जगह वही इकलौती सी... प्रगति 
मैदान . और जायेंगे भी कहाँ ? यहीं लगता आया है. पूरे दो साल बाद 
मौका मिला लेकिन इस बार अपने पास पलटन थी दोस्तों की. स्कूल, 
कॉलेज सब टाइम के दोस्त एक साथ.. मैंने सोचा सब एक साथ 
मिलेंगे तो जान पहचान बढ़ेगी और फिर जम के मस्ती भी होगी. तो 
दिल्ली और आस पास के इलाकों से फ़ौज निकल पड़ी...न न... 
पलटन.. 

हम चले फरीदाबाद से , एक चला मयूर विहार से, एक राजौरी, एक 
रिठाला, दो गाजियाबाद से... तो 6 लोगों की पलटन चली किताबों पर 
हमला करने. जो लेट थे उनके टिकट रखे और एंट्री कर ली. पहले हाल में 
घुसे..हिंदी का हॉल था.. अरे पलटन के सैनिकों के नाम बताना तो भूल 
ही गया- मैं था, tungesh , रतीश , अमित और सनी. कुछ स्टाल घूमने 
के बाद प्यास लगी तो सनी और अमित चले कोल्ड ड्रिंक की बोतल 
लेने. 

हमारा गला ठीक नहीं था तो गरम कॉफ़ी बढ़िया. अब देख रहे हैं कि 
सनी और अमित हँसे जा रहे हैं. कोल्ड ड्रिंक पिए भी जा रहे हैं, मुँह भी 
बना रहे हैं और हँस भी रहे हैं. पता चला की गरम बोतल है. पैसा देने 
के बाद अमित ने जब काउंटर वाले को बोला की फ्रिज ने निकाल कर 
दे रहे हो तो कम से कम ठंडी तो दो..



जवाब क्या मिला ? " सर फ्रिज में ट्यूब लाइट तो लगी है मगर वो ठंडा करने वाली नहीं है, सिर्फ लाइट के लिए है...फ्रिज तो चल ही नहीं रहा ". लो लग गयी चपत. जैसे तैसे खत्म की और आगे बढ़े वैसे ही पलटन तितर बितर हो गयी. कोई इधर, कोई उधर. हम चल दिए इस बीच रतीश को रिसीव करने. वापस आये तो देखा अमित और सनी राज कॉमिक्स के स्टाल पर कॉमिक्स देख रहे थे. मन किया की ले लूं मगर थोड़ी महँगी थी. 

हॉल से बहार निकले और गए हॉल नो. 12 में.. English सेक्शन. अब कुछ बात बनेगी. नामी प्रकाशक यहीं थे. मुझे क्या पता था यहाँ मेरी बैंड बज के रहेगी. एक तरफ भीड़ नज़र आयी. पता चला की Ruskin Bond आने वाले हैं. खड़े होने तक की जगह नहीं थी. मैंने सुन रखा था कि Ruskin bond की कहानियाँ हर उम्र के लोग पढ़ते हैं, आज देख भी लिया. भीड़ देख कर नहीं..किसी और वजह से. पिछले बुक फेयर में नैना मिली थी दो साल पहले.. इस बार कोई और . एक 50 साल के आसपास का आदमी एक ३०-३२ साल के युवक का हाथ पकड़े आगे कि तरफ ले आया. वो युवक भी नैना की ही तरह था- देख नहीं सकता था, हाथ में छड़ी थी मगर Ruskin bond को सुनने की लालसा सब पर भारी. उनके आते ही ज़ोरदार तालियों से उनका स्वागत. थोड़ा बहुत सुनने के बाद मैं चला आया. भीड़ बढ़ रही , खड़े होना थोड़ा मुश्किल था. वहाँ से खिसके एक स्टाल पर तो दिपाली जी नज़र आयीं . 

एक दोस्त के बुक लांच में आयीं थी. बुखार है, पर्स में गोलियां भर रखी हैं मगर...बुक फेयर आना है... ऐसे में लोगों का कुछ नहीं हो सकता. Tungesh कहीं और था, और बाकी हम पलटन के 4 लोग एक साथ. बाकी लोगों के सामने मुझे कवि कहा तो अजीब सा लगा. अचानक से " और भई Zombie " सुनाई दिया और धपाक पीठ पर हाथ आया किसी का. हमले से उभरे तो देखा आदित्य भसीन सामने. बहुत सही.. पलटे तो लो जी प्रियंका डे.. सारे Indibloggers एक साथ, एक ही जगह ? बाकी सब तो ठीक है मगर इन दोनों लेडीज ने अपने स्टाइल में क्लास लेनी शुरू की तो हम निकले वहाँ से. नहीं, डरते नहीं हैं, बस एक और दोस्त से मिलने का इंतज़ार था. मेरी बचपन की दोस्त अनुप्रिया. स्कूल के बाद आज 15 साल बाद मिलने का मौका था. पुराने दोस्तों के मिलने की ख़ुशी अलग ही बात होती है. 

कभी इस हॉल से उस हॉल करते करते वापास उसी हॉल में आये जिसमें पहले थे. Tungesh बातों में लगा था उससे. बहुत ख़ुशी हुई उसे देख कर. परिवार के साथ आयी थी. मज़ा आया. फिर कुछ बातें हुईं हम सब की कॉफ़ी पीते पीते. इधर हम स्कूल कि बातें कर रहे थे और उधर अमित को भी blogger बनने का बुखार चढ़ गया था. जब मेरे blogger दोस्त वहाँ मेरी क्लास लगा रहे थे तो सबको मज़ा आ रहा था.


कुछ वक़्त बाद अनुप्रिया चली गयी और हम सब बढ़े आखिरी हॉल की तरफ. मैं रोली बुक्स का स्टाल ढूंढ रहा था. हसरत थी बस परम वीर चक्र वाली कॉमिक्स देखने की. वही जिसको बढ़ावा देने के लिए मैंने वो कविता लिखी थी. मन था नयी कॉमिक्स खरीदने का. वहाँ पहुँचे तो देखा नयी वाली तो नहीं आयी थी मगर दो रखी हुई थी और देख कर साफ़ लगता था बहुत से लोग ले कर गये .. मेरी मेहनत बेकार नहीं गयी. आखिरी स्टाल पर गए तो Fighter Planes पर किताब देख कर मन और नियत डोल गयी. इनको कैसे छोड़ दूँ?

अब चले राजीव चौक थोड़ी पेट पूजा के लिए . मैक डी ढूँढ ही रहे थे बातें करते करते ही मिस्टर सहाय दिखे. वही खिलौने बेचने वाले CP में. इनकी कहानी मुझे ही पता थी. 3 साल पहले फेसबुक पर इनकी कहानी पढ़ी थी मगर कभी मौका नहीं मिला. Tungesh को बोला की उनकी फ़ोटो ले और उनसे मैंने 2 रबड़ वाले खिलौने लिए. दोस्तों में से किसी की भी समझ नहीं आया की इनकी फ़ोटो क्यूँ खिचवाई मैंने ? 

इनकी यह कहानी है ( जो मैंने पढ़ी है ) - रिटायर्ड बैंक मैनेजर हैं . उम्र कोई 77 -78 के पास. अपने बेटे की पढ़ाई, ऑफिस की लिए अपनी पूरी जमा पूँजी लगा दी. वो बिना किसी को बताये Bahrain चला गया CA की नौकरी के लिए. एक सड़क हादसे में उसकी मौत ही इन तक आयी. यह तो उसको देख भी नहीं पाये. तब से यह CP A - F ब्लाक के बीच कठपुतली नुमा खिलौने बेचते देखे जा सकते हैं. रोज़ रोहतक से आते हैं. पड़ोसियों को पता न लग जाए की वो यह सामान बेचते है दिल्ली में . परिवार में और कोई कमाने वाला नहीं है. पत्नी, बहू और उसके बच्चे हैं.


2011 में मैंने जो फ़ोटो देखी थी उसमें इनके पास एक झोला था जो इनके सेहत की हिसाब से भारी था..आज इनके पास उससे भी भारी ट्रैवेल बैग था...चलने के लिए walking stick . खम्बे का सहारा लिए खड़े हुए थे. शायद उनकी ट्रेन का वक़्त हो गया था तो बस उसके बाद वो बैग उठा कर चल दिए और हमारी सारी पलटन पेट पूजा की लिए restaurant क़े अंदर. हँसी मज़ाक क़े बाद हम भी चल दिए और एक यादगार शाम का अंत हुआ. मेरा काम तो शुरू ही हुआ था.. घर पहुँचते ही मिस्टर सहाय की फ़ोटो फेसबुक पर डाली इस उम्मीद में की उनकी यह latest तस्वीर लोगों तक पहुँचे और लोगों को पता चले की सेहत उनकी अब पहले से कितनी बदल चुकी है. मुझे यह नहीं पता था की जो मैं कर रहा हूँ वो क्यूँ कर रहा हूँ ? बस दिल कह रहा था की इनके बारे में दिल्ली को जानना चाहिए ( भले ही इन पर बहुत सारे Blog लिखे जा चुके हैं, इनको भी पता है की ऑनलाइन लोग इनको जानते हैं ) मेरा मकसद सिर्फ एक- कुछ ऐसा हो सके की इनको दोबारा काम करने की ज़रूरत ही न पड़े.. इसी उम्मीद में चल पड़ा यह मदद का सिलसिला. मेरी पलटन ने बढ़ चढ़ कर like और share करने में हिस्सा लिया.. अब तक कुल मिला कर 90 की आसपास Like और 38 shares हो चुके हैं. इनकी कहानी और आगे बढ़ेगी. मैं नहीं चाहता की लोग इनसे सहानुभूति क़े कारण सामान लें. इनका आत्मसम्मान है. यह ऐसे ही पैसे नहीं लेंगे. उस ठंडी रात में मैं जैकेट में था और उनके पास एक स्वेटर. अपनी मुहिम जारी है...पता नहीं किस अंजाम तक पहुँचेगी ? इसके बारे में और जानकारी बटोर रहे हैं. 

यार यह Book fair भी अजीब है. हर बार कुछ न कुछ करा देता है. पिछली बार नैना मिली थी, इस बार उसके जैसा ही एक और मिला, पुराने दोस्त मिले बरसों बाद, Blogger दोस्त मिले, मेरी Reputation का कुल्फी फालूदा भी हुआ, हँसी मज़ाक हुआ , ट्रेन पकड़ने छूटने क़े किस्से सुने , आमलेट की भर्जी बनी, खिचड़ी जलवा दी, मिस्टर सहाय मिले... एक दिन में इतना कुछ...

जो भी हो मज़ा आया खूब... थोड़ा मज़ा, थोड़ा फितूर ......बस यूँ ही...
   
दिल की कलम से : किताबें, दोस्त और कनॉट प्लेस वाले मिस्टर सहाय... दिल की कलम से : किताबें, दोस्त और कनॉट प्लेस वाले मिस्टर सहाय... Reviewed by Shwetabh on 6:18:00 PM Rating: 5

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