Memories

The places where moments reside

बिखरे काँच के टुकड़े...






एक ज़िन्दगी में बिखरे काँच के टुकड़े

ज़िन्दगी जो कभी चलने से पहले ही थम गई

थम गयी क्यूंकि मैं देख नहीं सकती, कभी बचपन में थोड़ा सा दिखने वाला भी कब बिलकुल ही अँधेरा कर गया, पता ही ना चला

सुरक्षा के लिए हाथ पकड़ना सहारे और रस्ते पे ठोकर लगने से बचने की जगह तब्दील हो गया

ज़िन्दगी में रंगों की जगह बस अब एक रंग ही रह गया, पता नहीं क्या कहते हैं उसे, कभी जान ही नहीं पायी

कदम कदम पे गिरने का डर, पहले ठोकर लग जाने का, अब भले ही चीज़ों का अंदाजा हो गया है मगर फिर भी भीड़ में , खुद को खो देती हूँ

पहले से आत्मनिर्भर भले ही हूँ थोड़ी मगर फिर भी उन लम्हों में कभी कभी किसी का हाथ थाम के चलना मेरी मजबूरी है 

कभी मेरी छड़ी साथ देती है मेरा तो फिर कभी मेरा यह “ Guide dog” *... 

भले अनजाने लोग मिल जाते हैं जो गाड़ियां रुकवा कर सड़क पार करा देते हैं, कुछ चंद क़दमों तक, तो कुछ अपने वक़्त की परवाह किये बगैर मुस्कुराते हुए मंजिल तक पहुँचा देते हैं 

पढ़ने की लालसा है मुझे, मगर ज्ञान के लिए ब्रेल के इंतज़ार में रहना पड़ता है

माँ पापा के लिए आज भी मैं उनकी नन्ही “परी” हूँ मगर न कहते हुए भी उनके दिल के दर्द के सैलाब का अंदाज़ है मुझे 

भाई मुझ पे जान छिड़कता है अपनी, मैं बड़ी उससे मगर कभी लगता है जैसे वो मुझसे कितना बड़ा है 

पापा कहते हैं की मुझे नयी आँखें मिल सकती हैं, इंतज़ार है उस पल का जब मैं फिर से देख सकूँगी

इस ज़िन्दगी की एक कसक तो है, ज़िन्दगी बिखरी हुई सिमट सी जाये

ज़िन्दगी में बिखरे काँच के टुकड़े...

टुकड़े सपनो के, आशाओं के, उम्मीदों के 

चल नहीं सकता मैं, औरों की तरह दौड़ नहीं सकता




दायरा पहले घर वालों के सहारे था, अब व्हीलचेयर या बैसाखी मेरा सहारा है 

बिना सहारे एक आम इंसान की तरह चलना चाहता हूँ मैं, चाहे भले ही दौड़ न सकूँ मगर अहिस्ता अहिस्ता कदम बढ़ाना चाहता हूँ 

जो औरों के लिए आम है, वो करना मेरे लिए ख़ास है 

क्या कभी औरों की तरह ही आम इंसान बन पाउँगा मैं ???

यह बिखरे कांच के टुकड़े...

यह चिड़िया कुछ कहती है मुझसे, यह उड़ता परिंदा भी न जाने क्या गुनगुनाता , मैं सुन तो सकती नहीं 

दिमाग में जंग चलती है रोज़ , जो मैं कहती हूँ उसका मतलब समझते नहीं लोग क्यूंकि उनकी बातों का मतलब मुझे समझ नहीं आता 

मेरे इशारे और मेरी बातें सिर्फ घर वाले समझते हैं 

सड़क या बाज़ार में किसी अनहोनी से डरते, हर वक़्त वो घबराए रहते हैं, 

लिखी बातें मैं पढ़ भी जाऊं, हिलते होंठ समझ न पाऊं

कान मशीन अब नयी दोस्त है मेरी, थोड़ा अलग महसूस कराती है .. मगर उसके बगैर सुनना चाहती हूँ मैं, हमेशा के लिए 

सुनना चाहती हूँ सुबह पंछियों का चहचहाना, दिवाली पे पटाखों की आवाज़, बरसात में बूंदों की आवाज़, त्योहारों में लोगों का शोर ... सुनना चाहती हूँ अपनों की आवाज़

ज़िन्दगी में बिखरे काँच के टुकड़े...

अपने दिल की बात कहना चाहते हूँ मगर लफ्ज़ साथ नहीं देते मेरे 

इशारों में समझाने की कोशिश करता हूँ तो कभी लोग समझ जाते हैं 

कागज़ कलम कभी कभी साथ देती है मेरा इसमें 

काश अपना प्यार जता पता वो जो पहली नज़र में दिल ले गयी मेरा 

घर वाले भी तरस गए होंगे मेरे मुंह से माँ पापा सुनने को, शायद कभी मौका आएगा उनका यह सपना पूरा होने को, शायद कभी..




ज़िन्दगी में बिखरे काँच के टुकड़े...

मैं सब कुछ कर लेती हूँ धीरे धीरे, बस समझने में वक़्त लगता है थोड़ा

शायद इसीलिए उम्र के मुकाबले थोड़ा पीछे रह गई बड़ी होने में 

समझ पूरी है...बस उतनी तेज़ नहीं चलती 

कोई बता दे क्या करना है फिर छोड़ दे मुझे अपने पे, जो ठान लिया वो पूरा हो के ही रहता है फिर 

काश मैं कभी जल्दी ठीक हो पाऊं, बस इंतज़ार है पूरी तरह आज़ाद होने की 

ज़िन्दगी में बिखरे काँच के टुकड़े.. कांच के टुकड़े मेरी बेटी के जो सुन नहीं सकती 

वो आवाजें जो उसके कानों तक पहुँचते ही गुम सी हो जाती है 

काँच के वो टुकड़े जो मेरी बेटी की आँखों के सामने अभी भी अँधेरा किये हुए हैं 

वो टुकड़े जब हटेंगे तो उसको इन्द्रधनुष दिखेगा रंगों का 

काँच के टुकड़े जिसके आगे मेरा बेटा कुछ बोल नहीं पाता

उसकी आवाज़ जो हम अब तक सुन नहीं पाए 

काँच के वो टुकड़े जिन्होंने मेरी बेटी के दिमाग को एक जगह थामा हुआ है 

काश कभी उन टुकड़ों से बाहर आ सके 

काँच के वो टुकड़े जिन्होंने रोक दिया है मेरे बेटे का खुद चल पाना 

काश कभी वो काँच के वो टुकड़े जो जुड़ कर उसके नीचे की ज़मीन बन जाए 

ज़िन्दगी में बिखरे काँच के ये टुकड़े, अगर जुड़ जाएँ तो शायद यह सब बदल जाएँ 

कब तक जीते रहेंगे, यह अपनी ज़िन्दगी कांच के टुकड़ों तले ??


                                          Guide dog
* Guide dogs- Specially trained dogs for visually impaired people who guide them to do various activities normally with guidance.

The story behind this- This poem takes you into the pain, thoughts, shattered dreams and lives of people suffering from various disabilities and their families. Each and every line is inspired from real people I have met and an attempt has been made to think what they are going through. They are fighting a battle of a different kind. What might be normal to us is a dream to them.. This is the story of their shattered dreams, the ones like shattered pieces of glass.
बिखरे काँच के टुकड़े... बिखरे काँच के टुकड़े... Reviewed by Shwetabh on 9:59:00 PM Rating: 5

1 comment:

  1. We should be thankful to God for giving us a healthy life!
    www.docdivatraveller.com

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