दिल की कलम से....वो राह देखता डब्बा



रोज़ घर लौटते वक़्त देखता हूँ उस आदमी को. Badarpur metro station के अंडरपास में एक टिन का डब्बा लिए हुए. नीले रंग की कमीज और पैंट, टाई लगाए, एक कोने में खड़ा ,आते जाते लोगों की भीड़ को देखता हुआ वो डब्बा पकड़े जिसके किनारे पर लिखा हुआ है. please donate for cancer patients. कुछ नहीं कहता है वो, कुछ भी नहीं.आप देख कर भी अनदेखा कर सकते हैं या डब्बे में कुछ डाल भी सकते हैं. आपकी मर्ज़ी है. अगर आपने कुछ डालने के लिए कदम आगे बढ़ाएं हैं तो वो ख़ुशी ख़ुशी आपकी तरफ डब्बा कर देगा और फिर सर झुका कर वैसे ही धन्यवाद कहेगा जैसे जापानी पहलवान कुश्ती से पहले सर झुकाते हैं. अगर आपकी नज़र जल्दी चले तो उसके गले में पड़ा a one foundation trust का I card दिख जाएगा. उसके जैसे और भी मिल जायेगे आपको अलग अलग जगह. CP के किसी भी inner circle में एक कोने में, vaishali के मेट्रो स्टेशन के बाहर. हाथ में डब्बा बिलकुल वैसे भी उठाये जैसे कोई चिराग हाथ में रखता है. हाँ चिराग ही तो है वो डब्बा किसी के लिए, किसी की उम्मीद, किसी के लिए ज़िन्दगी और मौत के बीच में चाँद लम्हों का फासला. अगर कोई इंसान दिखे तो अपनी भागती ज़िन्दगी में से कुछ पल रुक कर सोचें की आपके चंद कुछ नोट किसी के काम आ सकते हैं. वो छोटा डब्बा जो किसी और की ज़िन्दगी के लिए गुहार लगा रहा है हज़ारों से, हर शाम एक ही जगह पर खड़े हुए.कभी कभी जब ज़िन्दगी मौत से हारती लगती है तो दो लोग आ जाते हैं. एक उसी राह तकते डब्बे के साथ और दूसरा हाथ में बड़ा सा cardboard का बैनर लिए हुए मदद के लिए. अभी तीन दिन पहले ही मेरी कदम अचानक से रुक गए...

शायद हफ्ते भर से देख रहा था उसको वहाँ. उस उमस भरी रात में भी वो वहीँ खड़ा था. अपने काम की बढ़ाई नहीं कर रहा हूँ मगर उस वक़्त जेब में जित्ता भी था सब उस राह देखते डब्बे में डाल दिया. बस घर पहुँचने लायक पैसे अपने पास रखे. मेरी देखा देखी कुछ और लोग भी रुके और कुछ और बटुए भी खुले. हल्का बटुआ और गर्व से भारी दिल ले कर मैं घर चला आया. वो कहते हैं न की अगर कुछ अच्छा करने से दिल को अच्छा लगता है वो ही सही. सोचने वाली बात है न की कैसे एक इंसान का रुकना और चंद नोट उस डब्बे में डालना बाकियों के दिलो से भी मदद करा सकता है, कैसे एक मामूली सा टिन का डब्बा अपने अंदर ढ़ेर सारी ज़िन्दगियों के लिए प्रार्थना कर सकता है, कैसे एक इंसान रोज़ एक ही जगह पर खड़े होकर बिना कुछ कहे रोज़ एक नई मदद की उम्मीद कर सकता है. आजकल की दिल्ली में जहाँ लोग माँ बहन की गाली से नीचे बात नहीं करते वहाँ किसी का सर झुका कर मदद के लिए शुक्रिया करना नई बात है. 
तो जाइये , किसका इंतज़ार है? अगर ऐसा ही कोई बंदा दिखे डब्बा लिए तो अपने दिल की सुनिए और जो मन में आये उतना उसमें डाल दीजिये. कोशिश करिएगा कि तब डालें जब आपके आगे पीछे भी लोग हों ताकि चाहे आपको देख कर ही सही मगर और लोग भी कुछ डालें उस डब्बे में .. एक हल्का बटुए के साथ वो ख़ुशी मिलेगी जो शब्दों में बयान नहीं हो सकती क्यूंकि उससे कहीं ज़्यादा ख़ुशी उस राह तकते डब्बे को होती है, उसी राह तकते टिन के डब्बे को...
दिल की कलम से....वो राह देखता डब्बा दिल की कलम से....वो राह देखता डब्बा Reviewed by Shwetabh Mathur on 11:45:00 AM Rating: 5

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