Memories

The places where moments reside

वो गिर चुका पर्दा...





वो गिर चुका पर्दा...

वो बंद पड़ी इमारत में एक अजीब सा सन्नाटा है

वो टिकट खिड़की का टूटा काँच कभी लगती भीड़ के गवाह होगा 

वो जाली का बंद दरवाज़ा किसी दरबान की तरह लोगों का स्वागत करता होगा

वो धुंधला पड़ा किनारे फेंका गया “ हाउसफुल” का बोर्ड कभी किसी माला की तरह लटक कर ऊपर से मचलती भीड़ को देखता होगा

वो अँधेरे में सीट नंबर ढूंढना और आगे वाले को टोकना ”भाई साहब ज़रा सीट सीधी कर लें “

वो अँधेरे में चुपके से उसका हाथ थाम कर बैठना और इंटरवल के उजाले में नज़र दौड़कर किसी जाने पहचाने चेहरे को तलाश करना

वो इंटरवल खत्म होने से पहले पॉपकॉर्न और पानी लेकर जल्दी से वापस अपनी सीट पर भागना

वो रहस्य का सन्नाटा और उसको चीरती किसी कि कुर्सी की आवाज़

वो पर्दा उठते ही सीटियाँ और तालियाँ बजना

वो लोगों का पागलपन सितारों के लिए, वो किसी भी हाल में ब्लैक में टिकटों की मारामारी

दमदार सीन पे सिक्के उछलते थे कभी , अब अब सिक्कों कि खनक की कमी में ही बंद हो गया है यह 

वो गिर चुका पर्दा...

अब कहाँ वो बात नए सिनेमाघरों में है ?

अब फिल्म के बीच में बिजली चले जाने पे भीड़ हंगामा नहीं करती

अब किसी सीन को दोबारा दिखाने को नहीं बोलती

A movie hall in South India


अब कहाँ वो भीड़ का हुजूम निकलते हुए दिखता है?

अब कहाँ 12 से 3, 3 से 6 , 6 से 9, 9 से 12 सुनने को मिलता है ?

अब कहाँ किसी बड़ी नामी फिल्म के टिकट के लिए खिड़की पे जद्दोजहद होती है ?

डायलॉग्स पे सीटियाँ अब सुनने को कहाँ मिलती हैं ? 

हीरोइन के ठुमकों पे अब दीवानी भीड़ नाचती कहाँ दिखती है ?

अब गरीब भी कहाँ कोई फिल्म देख पाता है?

अब खाना पीना भी महँगा हो गया है, अब कहाँ कोई लाइन में लग कर कुछ लेता है ? 

अब रहस्य पर सन्नाटा नहीं छाता... मोबाइल फ़ोन की घंटी उस सन्नाटे को पल पल चीर देती है

अब मल्टीप्लेक्स की sophisticated भीड़ में सितारों के प्रति कहाँ वो जूनून दिखता है ?

अब परदे नहीं उठा करते, डायलाग पे सीटियाँ नहीं बजती , हाउसफुल के बोर्ड नहीं दिखते

अब देर से पहुँचने पर “ भाई साहब कितनी निकल गई “ कोई नहीं पूछता ..

अब खंडहरों में तब्दील हो चुके उन पुराने सिनेमाघरों का इतिहास बस लोगों के ज़ेहन में ही बचा है

अब कहानी के रहस्य का सन्नाटा नहीं बल्कि लोगों के न होने के वीरानेपन का सन्नाटा है

वक़्त के हाथों बिक गयी उन बालकनी और स्टाल के सीटों की लकड़ी भी दीमक धूल कर गई

वो मशीन और उसके चलने पे होने वाली आवाज़ भी हमेशा के लिए शांत हो गई 

वो पर्दा आखिरी बार गिरा तो फिर कभी नहीं उठा

वो आखिरी बार गिर चुका पर्दा...


Relive the days of the now closed down/sold/abandoned/razed single screen cinema halls in this era of expensive multiplexes which now exist only in the minds and hearts of the people. Wrote this after I noticed quite a few halls demolished/closed in recent years in Lucknow. The ones that remain are now just broken buildings. This city applies to every city in India. 
वो गिर चुका पर्दा... वो गिर चुका पर्दा... Reviewed by Shwetabh on 5:16:00 PM Rating: 5

1 comment:

  1. Its a sad scenario, Shwetabh.. The cost of 'mindless'progress!

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